Sunday, March 8, 2026

ॐ : ब्रह्माण्ड का आद्य नाद

 ॐ : ब्रह्माण्ड का आद्य नाद. 'ॐ ‘अ’, ‘ऊ’ और ‘म’ — इन तीन अक्षरों से मिलकर बना है।

भारतीय दर्शन में ॐ को नाद-ब्रह्म कहा गया है। यह वह अक्षर है जिससे सृष्टि का आरंभ माना जाता है। उपनिषदों में इसे प्रणव कहा गया है और समस्त मंत्रों का मूल स्वरूप माना गया है। योग, ध्यान, वेद, उपनिषद—सभी में ॐ की महत्ता सर्वोच्च मानी गई है।

ॐ के तीन अक्षर — ‘अ’, ‘ऊ’ और ‘म’

ॐ का उच्चारण तीन मूल ध्वनियों से मिलकर होता है—

अ (Aa)

ऊ (Oo)

म (Ma)

ये तीनों ध्वनि-रूप मिलकर वह परिपूर्ण स्पंदन उत्पन्न करती हैं जिसे हम “ॐ” कहते हैं। इनका आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व अत्यंत गहरा है।

1. ‘अ’ — सृजन का प्रतीक

‘अ’ ध्वनि की शुरुआत मुख के सबसे पहले खुले रूप से होती है। यह आरंभ, जन्म और सृजन का प्रतीक है। वेदों में इसे ब्रह्मा, अर्थात् सृष्टिकर्ता से जोड़ा गया है।

ध्यान में ‘अ’ का उच्चारण ऊर्जा की सक्रियता और जागरण का भाव उत्पन्न करता है।

2. ‘ऊ’ — संरक्षण का प्रतीक

‘ऊ’ ध्वनि ‘अ’ से निकलकर विस्तार पाती है और लंबी यात्रा का अनुभव कराती है।

यह पालन, विकास और स्थिरता का सूचक है। इस ध्वनि को विष्णु से संबद्ध माना जाता है, जो संरक्षण और संतुलन के देवता हैं।

3. ‘म’ — संहार और पूर्णता का प्रतीक

यह ध्वनि ओष्ठ (होंठ) बंद करके समाप्त होती है। यही कारण है कि ‘म’ समापन, शांति और लय का प्रतिनिधित्व करता है।

इस ध्वनि को शिव से जोड़ा गया है, जो संहार और परिवर्तन के देवता हैं — यानी नई सृष्टि के लिए स्थान बनाना।


ध्वनि-योग के तीन आयाम : अ, ऊ और म का शरीर पर प्रभाव


मानव शरीर ध्वनि-तरंगों के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। जब हम किसी विशेष ध्वनि का उच्चारण करते हैं, तो उससे उत्पन्न कंपन शरीर के अलग-अलग भागों को सक्रिय करता है। भारतीय परंपरा में “अ”, “ऊ” और “म” — इन तीन ध्वनियों को विशेष महत्व दिया गया है। ये न केवल “ॐ” के तीन घटक हैं, बल्कि इनका शरीर पर गहरा जैविक और मानसिक प्रभाव भी है।

1. ‘अ’ (Aa) — पेट और नाभि क्षेत्र को सक्रिय करता है

जब हम ‘अ’ का उच्चारण करते हैं, तो मुंह पूरी तरह खुलता है और ध्वनि नाभि से ऊपर की ओर उठती है।

इस ध्वनि से:

• पेट हल्का बाहर की ओर फैलता है

• डायाफ्राम सक्रिय होता है

• नाभि और उदर क्षेत्र में कंपन उत्पन्न होता है

इसका लाभ पाचन क्रिया, श्वास-प्रश्वास और आंतरिक ऊर्जा के प्रवाह को मिलता है। योग में इसे सृजन और सक्रियता की ध्वनि कहा गया है।

2. ‘ऊ’ (Oo) — छाती और हृदय क्षेत्र को प्रभावित करता है

‘ऊ’ की ध्वनि लंबी और गूंजदार होती है। इसका कंपन सीने के मध्य में स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।

• छाती में स्पंदन उत्पन्न होता है

• फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है

• हृदय क्षेत्र में शांति और विस्तार अनुभव होता है

यह ध्वनि भावनात्मक संतुलन, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ाती है।

3. ‘म’ (Ma) — सिर और मस्तिष्क को शांत करता है

‘म’ का उच्चारण ओंठ बंद करके किया जाता है, जिससे “हमिंग” जैसी ध्वनि निकलती है। यह ध्वनि सीधा मस्तिष्क तक कंपन पहुँचाती है।

• सिर और ब्रह्मरंध्र क्षेत्र में कंपन

• तंत्रिका तंत्र पर शांत प्रभाव

• तनाव में कमी और मानसिक स्पष्टता

ध्यान में यह ध्वनि सबसे अधिक उपयोग की जाती है क्योंकि यह मस्तिष्क में शांति, फोकस और आंतरिक स्थिरता लाती है।

‘अ’, ‘ऊ’ और ‘म’ — ये तीनों ध्वनियाँ शरीर के तीन प्रमुख केंद्रों को सक्रिय करती हैं:

• पेट (अ)

• छाती (ऊ)

• मस्तिष्क (म)

इन्हें क्रम से उच्चारित करने पर शरीर में नीचे से ऊपर तक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यही कारण है कि इन तीनों को मिलाकर बनी ध्वनि “ॐ” को ब्रह्माण्ड की पूर्ण ध्वनि कहा गया है।

ॐ : तीनों ध्वनियों का संगम

जब ‘अ’, ‘ऊ’ और ‘म’ आपस में मिलते हैं, तब जो नाद बनता है, वह ब्रह्माण्ड की कंपन ऊर्जा का प्रतीक है।

यह ध्वनि मन, शरीर और आत्मा—तीनों को संतुलित करती है।

ध्यान और योग में ॐ का जप मन को शांति, एकाग्रता और आंतरिक स्थिरता प्रदान करता है।

ॐ केवल एक अक्षर या धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि अस्तित्व की ध्वनि है।

• ‘अ’— आरंभ

• ‘ऊ’— विस्तार

• ‘म’— समापन

इन तीनों का संगम जीवन, प्रकृति और ब्रह्माण्ड के संपूर्ण चक्र को अभिव्यक्त करता है।

इसीलिए ॐ को पूर्णता का स्वर कहा गया है।

राकेश खरे

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